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ज़िन्दगी - II

ज़िन्दगी क्या कहलाती है? इस प्रश्न के उत्तर को क्या स्वयं प्रश्न को समझ पाना किसके लिए संभव है? गहनता को समेटे सब से लिपटी हुई फिर भी उस गहराई को समझना किसके लिए संभव है? वो भावनाएं को संचित किये असंख्य एहसास करवाती है उन एहसासों को समझना किसके लिए संभव है? सभी से प्रश्नों को समेट ते समय के साथ उत्तर तो देती है पर उस हर एक उत्तर को समझ पाना किसके लिए संभव है? विषाद और निशीथ की अवधि सभी में निश्चितता से वितरित करती, पर मनुष्य इस गूढ़ सी बात को समझ पाए कहाँ तक संभव है? दुःख की उदासी ,सुख की मुदिता की कैसे वृद्धि करती है, हर परिस्थिति में समझ पाना कहाँ तक संभव है? इस ज़िन्दगी के अनेक रूपों को उसके सांचे को समझ पाना किसके लिए संभव है? कहाँ तक संभव है? - प्रिया सिंह 

ज़िन्दगी

कुछ तो वो भी कह जाती है , मुझे खुल के हँसना जो सिखाती है | कभी प्रेरणा तो कभी दोस्त के रूप में, निराशा में भी ज्योत जलाती है | सब के लिए नए सिरे से परिभाषित नए अर्थों का मनन कराती है | चाहो तो प्रश्नों की पोटली समझो , तो कभी उत्तरों की कुंजी बन जाती है | उसके मायिने निराले, और तारतम्य उत्सव है, जिसकी व्याख्या अपूर्ण, और अस्ततित्व ही सब कुछ है , सहज बनके स्वीकारो तो वरदान,  अकुलाहट से स्वीकारो तो नरकीय बन जाती है |  क्या समझे हो इसके मर्म को कभी ? यही तो ज़िन्दगी कहलाती है | यही तो ज़िन्दगी कहलाती है | - प्रिया सिंह

Yearns

I want to live As if I just escaped from death I want to breathe As if i have just taken my birth I want to touch my soul Like a mother touches her baby for the first I want to sleep so calm Like a lotus seals petals after the dusk I want to speak my emotions As if it is a voice in itself I want to welcome life As happiness & joy is greeted I want to love faithfully Like a father’s warmth for his daughter I want to fly high Like a free bird in that blue sky I want to flow generously Carrying the noble wisp like a stream I want to be sought for Like a not yet fulfilled dream I want to touch the sky As the sun touches the horizon I want to be a light in the dim Like the moon in the night heaven I want to... -PRIYA SINGH