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बड़ा होता बचपन

उन दिनों की बात है ये, जब ज़बान ज़रा सी कच्ची थी होठों की मुस्कान मेरी सबकी निगाह में सच्ची थी जब ख्वाब देखे थे ऊँँचे ऊँँचे धरातल से जिसका काम न था ख़ुशी के धागो से बुनकर सपनों का बस एक महल बनाना था आज भी वही हूँ मैं बस वक़्त ज़रा सा गुज़रा है समझदारी के घूंघट में सपनों को बचा के रखा है व्यवहारिकता की सीमा में अब नए ख्वाब जनम लेते हैं खुश तब भी थी, खुश आज भी हूँ जीवनरीत शायद इसी को कहते हैं
आंधियो की ललकार पर हंस दिया करते थे कभी अब तो शांत किनारा भी डरा दिया करता है..

ज़िन्दगी - II

ज़िन्दगी क्या कहलाती है? इस प्रश्न के उत्तर को क्या स्वयं प्रश्न को समझ पाना किसके लिए संभव है? गहनता को समेटे सब से लिपटी हुई फिर भी उस गहराई को समझना किसके लिए संभव है? वो भावनाएं को संचित किये असंख्य एहसास करवाती है उन एहसासों को समझना किसके लिए संभव है? सभी से प्रश्नों को समेट ते समय के साथ उत्तर तो देती है पर उस हर एक उत्तर को समझ पाना किसके लिए संभव है? विषाद और निशीथ की अवधि सभी में निश्चितता से वितरित करती, पर मनुष्य इस गूढ़ सी बात को समझ पाए कहाँ तक संभव है? दुःख की उदासी ,सुख की मुदिता की कैसे वृद्धि करती है, हर परिस्थिति में समझ पाना कहाँ तक संभव है? इस ज़िन्दगी के अनेक रूपों को उसके सांचे को समझ पाना किसके लिए संभव है? कहाँ तक संभव है? - प्रिया सिंह 

ज़िन्दगी

कुछ तो वो भी कह जाती है , मुझे खुल के हँसना जो सिखाती है | कभी प्रेरणा तो कभी दोस्त के रूप में, निराशा में भी ज्योत जलाती है | सब के लिए नए सिरे से परिभाषित नए अर्थों का मनन कराती है | चाहो तो प्रश्नों की पोटली समझो , तो कभी उत्तरों की कुंजी बन जाती है | उसके मायिने निराले, और तारतम्य उत्सव है, जिसकी व्याख्या अपूर्ण, और अस्ततित्व ही सब कुछ है , सहज बनके स्वीकारो तो वरदान,  अकुलाहट से स्वीकारो तो नरकीय बन जाती है |  क्या समझे हो इसके मर्म को कभी ? यही तो ज़िन्दगी कहलाती है | यही तो ज़िन्दगी कहलाती है | - प्रिया सिंह