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बड़ा होता बचपन


उन दिनों की बात है ये,
जब ज़बान ज़रा सी कच्ची थी
होठों की मुस्कान मेरी
सबकी निगाह में सच्ची थी
जब ख्वाब देखे थे ऊँँचे ऊँँचे
धरातल से जिसका काम न था
ख़ुशी के धागो से बुनकर
सपनों का बस एक महल बनाना था

आज भी वही हूँ मैं
बस वक़्त ज़रा सा गुज़रा है
समझदारी के घूंघट में
सपनों को बचा के रखा है
व्यवहारिकता की सीमा में
अब नए ख्वाब जनम लेते हैं
खुश तब भी थी, खुश आज भी हूँ
जीवनरीत शायद इसी को कहते हैं

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संवेदनहीन सवाल

For the people who ask without emotions, just to know: मेरे मुख पर रिक्त सा भाव देखकर , प्रश्न जो तुमने किया है सोच लो, यह वह मधुर संवाद नहीं , जिसकी तुम्हे अपेक्षा है | मैं भी खूब समझती हूँ, इस प्रश्न से तुम्हारी क्या मंशा है , दुःख बांटना नहीं, बस जिज्ञासा शांत करने की तुम्हे इच्छा है | अपना भी रंज बताकर तुम आगे बढ़ जाओगे ; कहाँ सोचा था कभी तुमने जो आगे साथ निभाओगे , वो तो बस मन का कौतुहल था, जिसे मिटाने के लिए तुमने प्रश्नों की झड़ी लगाई | और क्या बस तुम्हे परवाह थी, जो तुम्हे अचानक मेरी याद आई ? उत्सुक मन को बहला कर, तुम बस एक धारणा बनाओगे ; दिल ही दिल में सोचकर एक राय स्थिर करवाओगे | पर अब मैं भी खूब समझती हूँ काले से अंतर को अपने भीतर बंद रखती हूँ | इस बाह्य दुनिया की रीत देख चुकी हूँ संवेदन-शून्य जाति का भेद बूझ चुकी हूँ |
जीवन की चाल अभी तेज़ है.. नज़र भी थोड़ी धुंधली.. जब ठहरेगी जिंदगी कुछ साल बाद.. सोचेंगे क्या खो दिया, क्या नहीं देखा.. | -प्रिया सिंह 
आंधियो की ललकार पर हंस दिया करते थे कभी अब तो शांत किनारा भी डरा दिया करता है..