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बड़ा होता बचपन


उन दिनों की बात है ये,
जब ज़बान ज़रा सी कच्ची थी
होठों की मुस्कान मेरी
सबकी निगाह में सच्ची थी
जब ख्वाब देखे थे ऊँँचे ऊँँचे
धरातल से जिसका काम न था
ख़ुशी के धागो से बुनकर
सपनों का बस एक महल बनाना था

आज भी वही हूँ मैं
बस वक़्त ज़रा सा गुज़रा है
समझदारी के घूंघट में
सपनों को बचा के रखा है
व्यवहारिकता की सीमा में
अब नए ख्वाब जनम लेते हैं
खुश तब भी थी, खुश आज भी हूँ
जीवनरीत शायद इसी को कहते हैं

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ज़िन्दगी - II

ज़िन्दगी क्या कहलाती है? इस प्रश्न के उत्तर को क्या स्वयं प्रश्न को समझ पाना किसके लिए संभव है? गहनता को समेटे सब से लिपटी हुई फिर भी उस गहराई को समझना किसके लिए संभव है? वो भावनाएं को संचित किये असंख्य एहसास करवाती है उन एहसासों को समझना किसके लिए संभव है? सभी से प्रश्नों को समेट ते समय के साथ उत्तर तो देती है पर उस हर एक उत्तर को समझ पाना किसके लिए संभव है? विषाद और निशीथ की अवधि सभी में निश्चितता से वितरित करती, पर मनुष्य इस गूढ़ सी बात को समझ पाए कहाँ तक संभव है? दुःख की उदासी ,सुख की मुदिता की कैसे वृद्धि करती है, हर परिस्थिति में समझ पाना कहाँ तक संभव है? इस ज़िन्दगी के अनेक रूपों को उसके सांचे को समझ पाना किसके लिए संभव है? कहाँ तक संभव है? - प्रिया सिंह 

आँखें ये जो मूँद ली हैं

कुछ सपनो की खातिर ही तो आँखें यूं जो मूँद ली है | मानो बंद नयनो में अब रौशनी की इक किरण दिखी है, अब जा कर सब साफ़ दिखा है हसरतो को आधार मिला है| कुछ सपनो की खातिर ही तो आँखें ये जो मूँद ली है | एहसास कुछ पा जाने का खोयी हुयी एक आस मिली है, दिल के भीतर अंतरमन में एक छोटी सी ज्योत जली है, पत्थरो के ऊपर ही से इक नयी सी राह दिखी है| आँखें तो अब आज खुली हैं स्वास में इक आग जली है, कुछ सपनो की खातिर ही तो आँखें यूं जो मूँद ली है | - प्रिया सिंह 

संवेदनहीन सवाल

For the people who ask without emotions, just to know: मेरे मुख पर रिक्त सा भाव देखकर , प्रश्न जो तुमने किया है सोच लो, यह वह मधुर संवाद नहीं , जिसकी तुम्हे अपेक्षा है | मैं भी खूब समझती हूँ, इस प्रश्न से तुम्हारी क्या मंशा है , दुःख बांटना नहीं, बस जिज्ञासा शांत करने की तुम्हे इच्छा है | अपना भी रंज बताकर तुम आगे बढ़ जाओगे ; कहाँ सोचा था कभी तुमने जो आगे साथ निभाओगे , वो तो बस मन का कौतुहल था, जिसे मिटाने के लिए तुमने प्रश्नों की झड़ी लगाई | और क्या बस तुम्हे परवाह थी, जो तुम्हे अचानक मेरी याद आई ? उत्सुक मन को बहला कर, तुम बस एक धारणा बनाओगे ; दिल ही दिल में सोचकर एक राय स्थिर करवाओगे | पर अब मैं भी खूब समझती हूँ काले से अंतर को अपने भीतर बंद रखती हूँ | इस बाह्य दुनिया की रीत देख चुकी हूँ संवेदन-शून्य जाति का भेद बूझ चुकी हूँ |