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ज़िन्दगी


कुछ तो वो भी कह जाती है ,
मुझे खुल के हँसना जो सिखाती है |
कभी प्रेरणा तो कभी दोस्त के रूप में,
निराशा में भी ज्योत जलाती है |
सब के लिए नए सिरे से परिभाषित
नए अर्थों का मनन कराती है |
चाहो तो प्रश्नों की पोटली समझो ,
तो कभी उत्तरों की कुंजी बन जाती है |
उसके मायिने निराले,
और तारतम्य उत्सव है,
जिसकी व्याख्या अपूर्ण,
और अस्ततित्व ही सब कुछ है ,
सहज बनके स्वीकारो तो वरदान, 
अकुलाहट से स्वीकारो तो नरकीय बन जाती है | 
क्या समझे हो इसके मर्म को कभी ?
यही तो ज़िन्दगी कहलाती है |
यही तो ज़िन्दगी कहलाती है |

- प्रिया सिंह

Comments

प्रश्नों के अंगारों में
मैं कुछ चमकता हुआ देखता हूँ
उन अंगारों में
मैं कुछ दहकता हुआ देखता हूँ
बार बार मैं उधर आकर्षित होता हूँ
उसमे जलता हूँ, पकता हूँ
पर उसका पीछा नहीं छोड़ता हूँ
और ये सोच मैं चकित होता हूँ
की मेरे प्रश्न का एक छोटा सा उतार
मझे बस समझ आता है
की जीवन जैसे प्रश्नों को
हल करना ही तो जीवन है!

...........
कविता सचमुच काफी विचार-पूर्ण प्रतीत हुई और साथ ही ये एहसास भी दे गयी की अभी भी विचारपूर्ण कविताओं का सूर्य अस्त नहीं हुआ है और ना आने वाले निकट भविष्य में ऐसा होगा|
आगे भी आप यूँ ही लिखते रहे, शुभकामनाओं सहित ! - पुष्पम भारद्वाज
Priya Singh said…
thank u pushpam :) dt ws too gud :)

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जीवन की चाल अभी तेज़ है.. नज़र भी थोड़ी धुंधली.. जब ठहरेगी जिंदगी कुछ साल बाद.. सोचेंगे क्या खो दिया, क्या नहीं देखा.. | -प्रिया सिंह 

देखा है मैंने

देखा है मैंने उस लौ को जलते धीमे धीमे, और बढ़ते देखा है मैंने उस आग में जलने की तपस और ऊपर उठने की चाह में देखा है मैंने उस इंधन सी लकड़ी को जल जाए जो लौ को बढाने में उसे और उंचा उठाने में देखा है मैंने उस त्याग को खुद जल कर बढ़ाये जो आंच को देखा है मैंने, उस कमज़ोर होती लौ में जिसे ऊपर उठाने की ज़रूरत में लकड़ी जल कर राख हुई देखा है मैंने उन सूखे पत्तो को निष्फल, व्यर्थ जिन्हें समझा गया हो लपट में झुलसे जो, देखा है मैंने उस लौ को भड़कते शोला बन कर हर तरफ धधकते फिर अचानक शांत हो कर जो फिर लगे बुझने देखा है मैंने उस मंद होती लौ को उसके जलने से ले कर उसके बुझ जाने क सफ़र को लकड़ी जली, जले सूखे पत्ते आग से, आग के लिए | लौ जली, उठी, उठती ही गयी अंत में बुझ कर शुक्रिया वो कह गयी त्याग है उसकी ऊँचाई का आधार जीवन है उसका, उनकी मृत्यु का उपहार |

संवेदनहीन सवाल

For the people who ask without emotions, just to know: मेरे मुख पर रिक्त सा भाव देखकर , प्रश्न जो तुमने किया है सोच लो, यह वह मधुर संवाद नहीं , जिसकी तुम्हे अपेक्षा है | मैं भी खूब समझती हूँ, इस प्रश्न से तुम्हारी क्या मंशा है , दुःख बांटना नहीं, बस जिज्ञासा शांत करने की तुम्हे इच्छा है | अपना भी रंज बताकर तुम आगे बढ़ जाओगे ; कहाँ सोचा था कभी तुमने जो आगे साथ निभाओगे , वो तो बस मन का कौतुहल था, जिसे मिटाने के लिए तुमने प्रश्नों की झड़ी लगाई | और क्या बस तुम्हे परवाह थी, जो तुम्हे अचानक मेरी याद आई ? उत्सुक मन को बहला कर, तुम बस एक धारणा बनाओगे ; दिल ही दिल में सोचकर एक राय स्थिर करवाओगे | पर अब मैं भी खूब समझती हूँ काले से अंतर को अपने भीतर बंद रखती हूँ | इस बाह्य दुनिया की रीत देख चुकी हूँ संवेदन-शून्य जाति का भेद बूझ चुकी हूँ |