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चार पंक्तियाँ बाल दिवस पर





बचपन के क्या दिन थे..
कुछ नासमझ से जो हम थे..
भोला सा वो अपना मन,
याद आये आज बचपन |
द्वेष और छल से वंचित था,
प्यार से केवल संचित था |
आज वक़्त की दौड़ में गुम है..
खोया खोया सा मासूम बचपन है |

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जीवन की चाल अभी तेज़ है.. नज़र भी थोड़ी धुंधली.. जब ठहरेगी जिंदगी कुछ साल बाद.. सोचेंगे क्या खो दिया, क्या नहीं देखा.. | -प्रिया सिंह 

संवेदनहीन सवाल

For the people who ask without emotions, just to know: मेरे मुख पर रिक्त सा भाव देखकर , प्रश्न जो तुमने किया है सोच लो, यह वह मधुर संवाद नहीं , जिसकी तुम्हे अपेक्षा है | मैं भी खूब समझती हूँ, इस प्रश्न से तुम्हारी क्या मंशा है , दुःख बांटना नहीं, बस जिज्ञासा शांत करने की तुम्हे इच्छा है | अपना भी रंज बताकर तुम आगे बढ़ जाओगे ; कहाँ सोचा था कभी तुमने जो आगे साथ निभाओगे , वो तो बस मन का कौतुहल था, जिसे मिटाने के लिए तुमने प्रश्नों की झड़ी लगाई | और क्या बस तुम्हे परवाह थी, जो तुम्हे अचानक मेरी याद आई ? उत्सुक मन को बहला कर, तुम बस एक धारणा बनाओगे ; दिल ही दिल में सोचकर एक राय स्थिर करवाओगे | पर अब मैं भी खूब समझती हूँ काले से अंतर को अपने भीतर बंद रखती हूँ | इस बाह्य दुनिया की रीत देख चुकी हूँ संवेदन-शून्य जाति का भेद बूझ चुकी हूँ |
आंधियो की ललकार पर हंस दिया करते थे कभी अब तो शांत किनारा भी डरा दिया करता है..