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कलयुग


जहाँ आज सब वक़्त से होड़ करतें हैं,
मैं पीछे बैठ सन्नाटे को सुनती हूँ,
इस भेड़ चाल में जब यहाँ वहाँ देखते सब ,
मैं उस नज़र को देख ताज्जुब करती हूँ,
इंसान की कीमत उसकी तरक्की से आंकना,
क्या यही इंसानो का मोल है?

निश्छल मन के मायिने नहीं ?
उसके अपने सपनो के रास्ते नहीं ?
शायद यही वो कलयुग है
जहाँ दर्द लोगो को नहीं जोड़ता है
शायद यही वो कलयुग है
जहा धक्का देकर मनुष्य विजय माला पिरोता है

-प्रिया सिंह 
 








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संवेदनहीन सवाल

For the people who ask without emotions, just to know: मेरे मुख पर रिक्त सा भाव देखकर , प्रश्न जो तुमने किया है सोच लो, यह वह मधुर संवाद नहीं , जिसकी तुम्हे अपेक्षा है | मैं भी खूब समझती हूँ, इस प्रश्न से तुम्हारी क्या मंशा है , दुःख बांटना नहीं, बस जिज्ञासा शांत करने की तुम्हे इच्छा है | अपना भी रंज बताकर तुम आगे बढ़ जाओगे ; कहाँ सोचा था कभी तुमने जो आगे साथ निभाओगे , वो तो बस मन का कौतुहल था, जिसे मिटाने के लिए तुमने प्रश्नों की झड़ी लगाई | और क्या बस तुम्हे परवाह थी, जो तुम्हे अचानक मेरी याद आई ? उत्सुक मन को बहला कर, तुम बस एक धारणा बनाओगे ; दिल ही दिल में सोचकर एक राय स्थिर करवाओगे | पर अब मैं भी खूब समझती हूँ काले से अंतर को अपने भीतर बंद रखती हूँ | इस बाह्य दुनिया की रीत देख चुकी हूँ संवेदन-शून्य जाति का भेद बूझ चुकी हूँ |
आंधियो की ललकार पर हंस दिया करते थे कभी अब तो शांत किनारा भी डरा दिया करता है..