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कलयुग


जहाँ आज सब वक़्त से होड़ करतें हैं,
मैं पीछे बैठ सन्नाटे को सुनती हूँ,
इस भेड़ चाल में जब यहाँ वहाँ देखते सब ,
मैं उस नज़र को देख ताज्जुब करती हूँ,
इंसान की कीमत उसकी तरक्की से आंकना,
क्या यही इंसानो का मोल है?

निश्छल मन के मायिने नहीं ?
उसके अपने सपनो के रास्ते नहीं ?
शायद यही वो कलयुग है
जहाँ दर्द लोगो को नहीं जोड़ता है
शायद यही वो कलयुग है
जहा धक्का देकर मनुष्य विजय माला पिरोता है

-प्रिया सिंह 
 








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