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नया वक्त



याद है वो शामें जो गुज़ारी थी
मैंने तुम्हारे साथ सूरज ढलते देखके..
चाय की चुस्कियों के संग
नयी ख्वाहिशो की बातें करके..

दो पल ठहर के सोचो ज़रा,
वहाँ से कितना दूर आ गए हम..
सपने सच होने लगे हैं
नए ख्वाबों को जगह देने लगे हैं :)

- प्रिया सिंह

Comments

Winnie said…
Here you go girl..!! 😃

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तेरी याद

आज बैठे तो कुछ और सोचा तुम्हे यूँ तो मन की हर छवि में तुम्हे उतरते देखा है चाय की चुस्की के साथ तुम्हे याद करके हर शाम को रात में बदलते देखा है अँधेरे ने जब जब ठण्ड की चादर ओढ़ी है अलाव कि गर्माहट में तुम्हारे स्पर्श का एहसास हो जाता है लपट की रौशनी में खो कर देखा जब भी तुम्हे तुम्हारा चेहरा मेरे मन का आईना सा लगता है इस खुश्क से मौसम और नंगी सर्द हवा में तुम्हारी याद का लम्हा कुछ थमा सा लगता है आदत हो जाती है वक़्त के साथ धीरे धीरे पर तुमसे दूरी का ख्याल आज भी अंजाना सा लगता है रास्ते पर ताकते हुए मैंने अपनी खिड़की से सन्नाटे को चीरती हर आवाज़ पर दिल को सम्भाला है एक झलक की ताक लगाये बैठी हूँ मैं कब से वो कहते हैं दूरियों का ही तो ज़माना है

संवेदनहीन सवाल

For the people who ask without emotions, just to know: मेरे मुख पर रिक्त सा भाव देखकर , प्रश्न जो तुमने किया है सोच लो, यह वह मधुर संवाद नहीं , जिसकी तुम्हे अपेक्षा है | मैं भी खूब समझती हूँ, इस प्रश्न से तुम्हारी क्या मंशा है , दुःख बांटना नहीं, बस जिज्ञासा शांत करने की तुम्हे इच्छा है | अपना भी रंज बताकर तुम आगे बढ़ जाओगे ; कहाँ सोचा था कभी तुमने जो आगे साथ निभाओगे , वो तो बस मन का कौतुहल था, जिसे मिटाने के लिए तुमने प्रश्नों की झड़ी लगाई | और क्या बस तुम्हे परवाह थी, जो तुम्हे अचानक मेरी याद आई ? उत्सुक मन को बहला कर, तुम बस एक धारणा बनाओगे ; दिल ही दिल में सोचकर एक राय स्थिर करवाओगे | पर अब मैं भी खूब समझती हूँ काले से अंतर को अपने भीतर बंद रखती हूँ | इस बाह्य दुनिया की रीत देख चुकी हूँ संवेदन-शून्य जाति का भेद बूझ चुकी हूँ |