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देखा है मैंने

देखा है मैंने उस लौ को जलते धीमे धीमे, और बढ़ते देखा है मैंने उस आग में जलने की तपस और ऊपर उठने की चाह में देखा है मैंने उस इंधन सी लकड़ी को जल जाए जो लौ को बढाने में उसे और उंचा उठाने में देखा है मैंने उस त्याग को खुद जल कर बढ़ाये जो आंच को देखा है मैंने, उस कमज़ोर होती लौ में जिसे ऊपर उठाने की ज़रूरत में लकड़ी जल कर राख हुई देखा है मैंने उन सूखे पत्तो को निष्फल, व्यर्थ जिन्हें समझा गया हो लपट में झुलसे जो, देखा है मैंने उस लौ को भड़कते शोला बन कर हर तरफ धधकते फिर अचानक शांत हो कर जो फिर लगे बुझने देखा है मैंने उस मंद होती लौ को उसके जलने से ले कर उसके बुझ जाने क सफ़र को लकड़ी जली, जले सूखे पत्ते आग से, आग के लिए | लौ जली, उठी, उठती ही गयी अंत में बुझ कर शुक्रिया वो कह गयी त्याग है उसकी ऊँचाई का आधार जीवन है उसका, उनकी मृत्यु का उपहार |

Dream for tomorrow

Mystical dreams of my core Inclines me through a door, With spark of courage to go on.. Intricate route to chase Flow against niggling waves, But a dainty dream to hold on.. Gloomy shadow from inside But almighty by my side.. I will surely perceive the dawn.. In the making of tomorrow Let me struggle through the sorrow, And a new me will born.. Closing my eyes, still awake Making sure of final step, I will take, Tomorrow will not be far off..
रास्ते पर उनके नज़रे जमाये बैठे हैं दिल में अपने ख्वाब सजाये बैठे हैं खबर न हो उनको इस दिल की बेचैनी की इसीलिए धडकनों पर पहरा लगाए बैठे हैं
आंधियो की ललकार पर हंस दिया करते थे कभी अब तो शांत किनारा भी डरा दिया करता है..

चार पंक्तियाँ बाल दिवस पर

बचपन के क्या दिन थे.. कुछ नासमझ से जो हम थे.. भोला सा वो अपना मन, याद आये आज बचपन | द्वेष और छल से वंचित था, प्यार से केवल संचित था | आज वक़्त की दौड़ में गुम है.. खोया खोया सा मासूम बचपन है |

कलयुग

जहाँ आज सब वक़्त से होड़ करतें हैं, मैं पीछे बैठ सन्नाटे को सुनती हूँ, इस भेड़ चाल में जब यहाँ वहाँ देखते सब , मैं उस नज़र को देख ताज्जुब करती हूँ, इंसान की कीमत उसकी तरक्की से आंकना, क्या यही इंसानो का मोल है? निश्छल मन के मायिने नहीं ? उसके अपने सपनो के रास्ते नहीं ? शायद यही वो कलयुग है जहाँ दर्द लोगो को नहीं जोड़ता है शायद यही वो कलयुग है जहा धक्का देकर मनुष्य विजय माला पिरोता है -प्रिया सिंह