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आँखें ये जो मूँद ली हैं


कुछ सपनो की खातिर ही तो
आँखें यूं जो मूँद ली है |
मानो बंद नयनो में अब
रौशनी की इक किरण दिखी है,
अब जा कर सब साफ़ दिखा है
हसरतो को आधार मिला है|

कुछ सपनो की खातिर ही तो
आँखें ये जो मूँद ली है |
एहसास कुछ पा जाने का
खोयी हुयी एक आस मिली है,
दिल के भीतर अंतरमन में
एक छोटी सी ज्योत जली है,
पत्थरो के ऊपर ही से
इक नयी सी राह दिखी है|

आँखें तो अब आज खुली हैं
स्वास में इक आग जली है,
कुछ सपनो की खातिर ही तो
आँखें यूं जो मूँद ली है |

- प्रिया सिंह 


Comments

बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति है आत्म-विश्वास कि, भरोसे की! वाकई !
Ranu said…
kaviyatri priya singh.. aap to din va din chhate hi ja rhe ho ... nice poem yr...:)
safar said…
दिल के भीतर अंतरमन में एक छोटी सी ज्योत जली है,
पत्थरो के ऊपर ही से इक नयी सी राह दिखी है|...sahi hai!!!
Ameya said…
kavita padhne ke baad aankhen khul gayi hain :)
Utkarsh said…
कविता ने दिल को वहाँ छुआ है,
जहाँ आशा की एक लौ दिखी है |
अब तो ख्वाब सच होने का,
इक पूरी सी उम्मीद जगी है |

जिन सपनों की खातिर मैंने,
आँखें यूँ जो मूंद ली थी,
अब ज्वलित होता दिख रहा,
रास्ते की वो आखिरी सीढ़ी |