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आंधियो की ललकार पर हंस दिया करते थे कभी अब तो शांत किनारा भी डरा दिया करता है..

चार पंक्तियाँ बाल दिवस पर

बचपन के क्या दिन थे.. कुछ नासमझ से जो हम थे.. भोला सा वो अपना मन, याद आये आज बचपन | द्वेष और छल से वंचित था, प्यार से केवल संचित था | आज वक़्त की दौड़ में गुम है.. खोया खोया सा मासूम बचपन है |

कलयुग

जहाँ आज सब वक़्त से होड़ करतें हैं, मैं पीछे बैठ सन्नाटे को सुनती हूँ, इस भेड़ चाल में जब यहाँ वहाँ देखते सब , मैं उस नज़र को देख ताज्जुब करती हूँ, इंसान की कीमत उसकी तरक्की से आंकना, क्या यही इंसानो का मोल है? निश्छल मन के मायिने नहीं ? उसके अपने सपनो के रास्ते नहीं ? शायद यही वो कलयुग है जहाँ दर्द लोगो को नहीं जोड़ता है शायद यही वो कलयुग है जहा धक्का देकर मनुष्य विजय माला पिरोता है -प्रिया सिंह   

आँखें ये जो मूँद ली हैं

कुछ सपनो की खातिर ही तो आँखें यूं जो मूँद ली है | मानो बंद नयनो में अब रौशनी की इक किरण दिखी है, अब जा कर सब साफ़ दिखा है हसरतो को आधार मिला है| कुछ सपनो की खातिर ही तो आँखें ये जो मूँद ली है | एहसास कुछ पा जाने का खोयी हुयी एक आस मिली है, दिल के भीतर अंतरमन में एक छोटी सी ज्योत जली है, पत्थरो के ऊपर ही से इक नयी सी राह दिखी है| आँखें तो अब आज खुली हैं स्वास में इक आग जली है, कुछ सपनो की खातिर ही तो आँखें यूं जो मूँद ली है | - प्रिया सिंह 

जय का कोई विकल्प नहीं

Dedicated to Naincy..  यह हार तो नहीं प्रिये बिगुल है उस चुनौती का | समक्ष ही खड़ी है जो उसे तुम यूँ स्वीकार लो | भय तो तेरा स्वभाव नहीं यह स्वभाव है बस हार का; पराजय तब तक होती नहीं, स्वीकार जब तक हो नहीं | विजय को तेरी आस है मिलेगी जब तक प्यास है, प्यास को न बुझा इस आग में बढ़ा ले अब इस ताप में | जीवन है, विजयगीत नहीं इस बात को भी गाठ लो | फिर लक्ष्य क्या और जीत क्या ? हार क्या वो बात क्या ? हौसलों को ऊंचा रखना है, आसमा को भी दिखाना है ; इरादे हो तो बस और क्या चुनौती भी सर झुकाती है, जय का कोई विकल्प नहीं यही तो हार हमे सिखाती है| -   प्रिया सिंह 

ज़िन्दगी - II

ज़िन्दगी क्या कहलाती है? इस प्रश्न के उत्तर को क्या स्वयं प्रश्न को समझ पाना किसके लिए संभव है? गहनता को समेटे सब से लिपटी हुई फिर भी उस गहराई को समझना किसके लिए संभव है? वो भावनाएं को संचित किये असंख्य एहसास करवाती है उन एहसासों को समझना किसके लिए संभव है? सभी से प्रश्नों को समेट ते समय के साथ उत्तर तो देती है पर उस हर एक उत्तर को समझ पाना किसके लिए संभव है? विषाद और निशीथ की अवधि सभी में निश्चितता से वितरित करती, पर मनुष्य इस गूढ़ सी बात को समझ पाए कहाँ तक संभव है? दुःख की उदासी ,सुख की मुदिता की कैसे वृद्धि करती है, हर परिस्थिति में समझ पाना कहाँ तक संभव है? इस ज़िन्दगी के अनेक रूपों को उसके सांचे को समझ पाना किसके लिए संभव है? कहाँ तक संभव है? - प्रिया सिंह